मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के तेजी से बढ़ते तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (21 मार्च 2026) को ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेश्कियन से टेलीफोन पर महत्वपूर्ण बातचीत की। यह दोनों नेताओं के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद दूसरी ऐसी बातचीत थी, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा और शांति बहाली पर जोर दिया गया।
पीएम मोदी ने अपनी एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में लिखा, “राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से बात की और उन्हें ईद तथा नवरोज की शुभकामनाएं दीं। हमने उम्मीद जताई कि त्योहारों का यह मौसम पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और समृद्धि लाए। मैंने क्षेत्र में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों की निंदा की, जो क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डालते हैं और वैश्विक सप्लाई चेन को बिगाड़ते हैं। महत्वपूर्ण नेविगेशन की स्वतंत्रता की रक्षा और शिपिंग लेन को खुले व सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।”
ईरानी पक्ष से जारी बयान में राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने कहा कि ईरान ने युद्ध शुरू नहीं किया है, बल्कि अमेरिका और “ज़ायोनी शासन” (इजरायल) की निरंतर सैन्य आक्रामकता के कारण स्थिति बिगड़ी है। उन्होंने तत्काल “अमेरिका-इजरायल आक्रामकता” को रोकने की मांग की और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए गारंटी की आवश्यकता बताई।
ईरान ने भारत की BRICS अध्यक्षता का जिक्र करते हुए अपील की कि BRICS समूह “स्वतंत्र भूमिका” निभाकर ईरान के खिलाफ आक्रामकता रोकने और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय शांति व स्थिरता सुनिश्चित करने में योगदान दे। राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने पश्चिम एशिया में सुरक्षा ढांचे की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा।
यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान की ओर से नाकाबंदी के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है, ऊर्जा कीमतें आसमान छू रही हैं और क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। पीएम मोदी ने शिपिंग रूट्स की सुरक्षा और वैश्विक व्यापार की निरंतरता पर विशेष जोर दिया, क्योंकि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है।
यह दूसरी बार है जब फरवरी 28 से शुरू हुए इस संघर्ष के बाद दोनों नेताओं ने बात की। इससे पहले 12 मार्च को भी मोदी ने पेजेश्कियन से बात की थी, जिसमें भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और डिप्लोमेसी के माध्यम से तनाव कम करने पर चर्चा हुई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह कूटनीतिक सक्रियता क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने और डायलॉग को बढ़ावा देने की कोशिश है। भारत ने लगातार डी-एस्केलेशन, डायलॉग और डिप्लोमेसी की वकालत की है, ताकि युद्ध और व्यापक न हो।image-ai generated
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




