Saryu Sandhya News

राजनाथ सिंह का बड़ा बयान: ‘सीमाएं स्थायी नहीं, सिंध भारतीय सभ्यता का हिस्सा बना रहेगा; कल को वापस लौट सकता है भारत’

नई दिल्ली, 23 नवंबर 2025 (स्पेशल रिपोर्ट) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज सिंधी समाज के एक समागम में कहा कि भले ही सिंध भौगोलिक रूप से भारत का हिस्सा न हो, लेकिन यह हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग बना रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सीमाएं स्थायी नहीं होतीं और ‘कल को सिंध दोबारा भारत लौट सकता है’। यह बयान दिल्ली में आयोजित ‘सिंधी समाज सम्मेलन’ में दिया गया, जहां सिंधी समुदाय के सदस्यों ने विभाजन की पीड़ा साझा की।

सिंधी भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने सिंधी हिंदुओं के योगदान को याद किया और कहा, “सिंध हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। 1947 के विभाजन के बाद लाखों सिंधी हिंदू भारत आ गए, लेकिन उनका दिल हमेशा सिंध के लिए धड़कता रहा।” उन्होंने बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का हवाला देते हुए कहा कि सिंध का भारत से सभ्यतागत जुड़ाव कभी टूटा नहीं। “सीमाएं बदल सकती हैं, और कौन जाने, कल सिंध फिर से भारत का हिस्सा बन जाए।”

राजनाथ सिंह ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का भी जिक्र किया, जो सिंधी हिंदुओं समेत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करता है। उन्होंने कहा, “यह कानून विभाजन की जख्मों को भरने का प्रयास है। सिंधी समाज ने भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और हम उनके दर्द को समझते हैं।” कार्यक्रम में सिंधी समुदाय के प्रमुखों ने राजनाथ सिंह को स्मृति चिन्ह भेंट किया और उनके बयान पर तालियां बजाईं।

यह बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष ने इसे ‘उत्तेजक’ बताते हुए कहा कि यह पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकता है। वहीं, बीजेपी ने इसे सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताया। सोशल मीडिया पर #SindhReturnsToIndia और #RajnathOnSindh जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां लोग पुरानी तस्वीरें और कहानियां शेयर कर रहे हैं।

सिंध, जो स्वतंत्रता पूर्व अविभाजित भारत का हिस्सा था, 1947 में पाकिस्तान को मिल गया। तब से लाखों सिंधी हिंदू भारत चले आए, जिन्होंने मुंबई, दिल्ली और गुजरात में नई जिंदगी बसाई। राजनाथ सिंह का यह बयान न केवल सिंधी समुदाय को भावनात्मक समर्थन देता है, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों पर भी नई बहस छेड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है, जो इंडस घाटी सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक बंधनों को रेखांकित करता है।

saryusandhyanews
Author: saryusandhyanews

SENIOR JOURNALIST

Spread the love

यह भी पढ़ें

टॉप स्टोरीज