लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक बार फिर अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बसपा दलित आधार के साथ-साथ ब्राह्मण और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को जोड़ने की नई कोशिश कर रही है।
बसपा की 2007 की ऐतिहासिक जीत में पार्टी की ‘सर्वजन’ (Social Engineering) रणनीति को बड़ी सफलता मिली थी। उस समय ब्राह्मण समुदाय को पार्टी से जोड़ने में राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई थी। इसी कारण उन्हें पार्टी का रणनीतिकार और राजनीतिक हलकों में अक्सर ‘बसपा का चाणक्य’ कहा जाता है। यह एक राजनीतिक उपमा है, कोई आधिकारिक पदवी नहीं।
वर्ष 2026 में भी राजनीतिक चर्चाओं के बीच संकेत मिल रहे हैं कि बसपा नेतृत्व एक बार फिर ब्राह्मण नेतृत्व को प्रमुखता देने के साथ-साथ ओबीसी वर्ग में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। पार्टी संगठन में सतीश चंद्र मिश्रा और अन्य वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय भूमिका दिए जाने को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में केवल दलित वोट बैंक के सहारे सत्ता तक पहुंचना कठिन है। ऐसे में यदि ब्राह्मण, गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं का व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार होता है, तो बसपा चुनावी मुकाबले में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर सकती है। हालांकि, यह रणनीति कितनी सफल होगी, इसका फैसला अंततः मतदाता करेंगे।
बसपा ने अतीत में भी ब्राह्मण सम्मेलनों और सामाजिक संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया था। सतीश चंद्र मिश्रा लंबे समय से इस अभियान का प्रमुख चेहरा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा की सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखते हुए नए सामाजिक समीकरण तैयार करना होगी। यदि पार्टी ब्राह्मण, दलित और ओबीसी समुदायों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित कर पाती है, तो उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में उसकी भूमिका पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली हो सकती है। फिलहाल पार्टी की रणनीति और उसके चुनावी परिणामों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST



