नई दिल्ली: UNMOGIP की 76 साल पुरानी टीम भारत के लिए बोझ साबित, केवल भारत की सुविधाओं का फायदा उठाया, कुछ नहीं दिया — विदेश मंत्रालय ने UNMOGIP को देश छोड़ने को कहा
नई दिल्ली, 21 मई 2026: भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब उनकी भारत में कोई जरूरत नहीं है। पिछले 76 वर्षों से लगातार मौजूद यह टीम भारत की जमीन, संसाधनों और सुविधाओं का इस्तेमाल तो करती रही, लेकिन जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर कोई ठोस योगदान नहीं दिया। अब विदेश मंत्रालय ने उनके वीजा रद्द कर दिए हैं और उन्हें देश छोड़ने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
UNMOGIP — सिर्फ बोझ, कोई फायदा नहीं
1949 में स्थापित UNMOGIP को शुरू में युद्धविराम की निगरानी का काम सौंपा गया था। लेकिन 1972 के शिमला समझौते के बाद भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि कश्मीर अब द्विपक्षीय मुद्दा है और UN की कोई भूमिका नहीं बची। इसके बावजूद यह टीम 76 साल तक भारत में टिकी रही।
आलोचकों के अनुसार:
- UNMOGIP ने पाकिस्तान की शिकायतों को बढ़ावा दिया, लेकिन भारत की चिंताओं को नजरअंदाज किया।
- भारत की तरफ से सीजफायर उल्लंघनों की रिपोर्टिंग प्रभावी ढंग से नहीं की।
- टीम ने केवल भारत की सुविधाओं — दिल्ली में सरकारी बंगला, श्रीनगर में मुख्यालय, सुरक्षा और लॉजिस्टिक सपोर्ट — का फायदा उठाया, लेकिन बदले में कुछ नहीं दिया।
- आर्टिकल 370 हटने के बाद कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन चुका है, फिर भी यह पुरानी टीम अनावश्यक हस्तक्षेप की प्रतीक बनी रही।
सरकार की सख्त कार्रवाई
सूत्रों के अनुसार, सरकार ने UNMOGIP के वीजा रद्द कर दिए हैं और उन्हें 10 दिनों के अंदर भारत छोड़ने को कहा है। यह कदम भारत की संप्रभुता और “अब कोई तीसरा पक्ष नहीं” की नीति को मजबूती से दर्शाता है। पहले भी 2014 में दिल्ली स्थित उनके सरकारी बंगले को खाली कराने के लिए सरकार ने कहा था, लेकिन अब पूर्ण निकासी का फैसला लिया गया है।
विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “UNMOGIP अपना मिशन पूरा कर चुका है। अब यह केवल खर्चा बढ़ाने वाला और पुराना ढांचा है। भारत अब ऐसे अनावश्यक अंतरराष्ट्रीय मिशनों को सहन नहीं करेगा जो केवल मौजूद रहने के लिए भारत की सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।”
76 साल का ‘बेकार’ रिकॉर्ड
- भारत ने UN शांति मिशनों में हजारों सैनिक दिए, लेकिन UNMOGIP ने भारत को कुछ नहीं दिया।
- पाकिस्तान की तरफ यह टीम ज्यादा सक्रिय रही, जबकि भारत की तरफ उनकी गतिविधियां सीमित कर दी गई थीं।
- करोड़ों रुपये का खर्च भारत और UN पर पड़ा, जबकि नतीजा शून्य।
यह फैसला भारत की नई विदेश नीति और “आत्मनिर्भर” रुख का प्रतीक माना जा रहा है। अब कश्मीर पर कोई बाहरी निगरानी नहीं चलेगी — यह पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




