बीजिंग, 3 नवंबर 2025 (विशेष संवाददाता): अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परमाणु परीक्षणों को फिर से शुरू करने के विवादास्पद बयान पर चीन ने रविवार को कड़ा खंडन किया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के दावों को ‘बेबुनियाद’ बताते हुए कहा कि अमेरिका को परमाणु परीक्षणों पर वैश्विक प्रतिबद्धताओं का सख्ती से पालन करना चाहिए। यह बयान ट्रंप के उस इंटरव्यू के बाद आया है, जिसमें उन्होंने चीन और रूस पर गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण करने का आरोप लगाया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव अमेरिका-चीन संबंधों में नई जटिलताएं पैदा कर सकता है, खासकर जब दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध और दक्षिण चीन सागर विवाद पहले से ही तनावपूर्ण हैं।
ट्रंप ने 1 नवंबर को प्रसारित ’60 मिनट्स’ इंटरव्यू में बिना सबूत के दावा किया था, “रूस परमाणु हथियारों का परीक्षण कर रहा है, और चीन भी ऐसा ही कर रहा है।” उन्होंने कहा कि अमेरिका को भी “समान आधार पर” परीक्षण शुरू करने चाहिए। इससे पहले, 29 अक्टूबर को दक्षिण कोरिया में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक से ठीक पहले ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पेंटागन को निर्देश दिया था कि 33 वर्ष पुराने प्रतिबंध को हटाकर परमाणु परीक्षण फिर से शुरू किए जाएं। ट्रंप के इस कदम ने उनके सलाहकारों को भी चौंका दिया था, और ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने स्पष्ट किया कि परीक्षणों में वास्तविक परमाणु विस्फोट नहीं होंगे, बल्कि हथियारों के अन्य हिस्सों की जांच पर फोकस होगा।
चीन का स्पष्ट खंडन: ‘हमारी नीति अपरिवर्तनीय’
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने रविवार को नियमित संवाददाता सम्मेलन में ट्रंप के बयान को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “चीन की परमाणु नीति रक्षात्मक है और न्यूनतम प्रतिरोध पर आधारित है। हम 1996 के बाद से कोई परमाणु परीक्षण नहीं कर रहे हैं। अमेरिका को अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए और वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को कमजोर करने वाले कदमों से बचना चाहिए।” वांग ने ट्रंप के दावों को “भ्रम फैलाने वाला” बताया और जोर दिया कि चीन का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है।
चीन ने सितंबर 2025 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ पर बीजिंग में आयोजित सैन्य परेड में नए हथियारों का प्रदर्शन किया था, जिसमें YJ-19 हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइलें शामिल थीं। लेकिन चीन ने स्पष्ट किया कि यह ‘न्यूनतम प्रतिरोध’ की नीति के अनुरूप है, न कि आक्रामक विस्तार का। पेंटागन के अनुमान के अनुसार, चीन 2030 तक 1,000 और 2035 तक 1,500 परमाणु हथियार तैनात कर सकता है, लेकिन परीक्षणों पर प्रतिबंध का पालन कर रहा है। चीन ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि ट्रंप का बयान वैश्विक तनाव बढ़ाने का प्रयास है, जबकि रूस ने भी इस कदम की निंदा की है।
ट्रंप का बयान: व्यापार वार्ता से पहले ‘ट्विस्ट’
ट्रंप का यह बयान दक्षिण कोरिया में शी जिनपिंग के साथ बैठक से ठीक पहले आया, जहां दोनों नेताओं ने व्यापार युद्ध को कम करने पर चर्चा की। शी ने बैठक की शुरुआत में “ट्विस्ट एंड टर्न्स” का जिक्र किया, लेकिन ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट ने माहौल को ठंडा कर दिया। ट्रंप ने बाद में कहा कि उनका निर्णय चीन पर केंद्रित नहीं था, बल्कि “अन्य देशों” पर। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह अमेरिका की आधुनिकीकरण रणनीति को प्रभावित कर सकता है और चीन को फायदा पहुंचा सकता है।
वैश्विक प्रभाव: अप्रसार संधि पर खतरा
ट्रंप का बयान परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) को चुनौती देता नजर आता है, जिसे अमेरिका ने 1996 में साइन किया लेकिन रैटिफाई नहीं किया। दुनिया के नौ परमाणु शक्तियों में से केवल उत्तर कोरिया ही हाल के दशकों में परीक्षण कर रहा है। पूर्व अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप का कदम आधुनिकीकरण प्रयासों को पीछे धकेल सकता है और चीन-रूस के साथ तनाव बढ़ा सकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में कहा गया कि यह “खतरनाक” है, क्योंकि यह नई परमाणु प्रसार की दौड़ को जन्म दे सकता है।
चीन ने संयुक्त राष्ट्र में भी इस मुद्दे को उठाने की चेतावनी दी है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका-चीन के बीच अविश्वास गहरा रहा है, और परमाणु मुद्दा व्यापार से कहीं अधिक गंभीर है। जैसे-जैसे ट्रंप प्रशासन की नीतियां स्पष्ट होती जाएंगी, वैश्विक सुरक्षा पर इसका असर नजर आएगा। फिलहाल, चीन का खंडन द्विपक्षीय संवाद को मजबूत करने की अपील के साथ आया है, लेकिन तनाव की आशंका बरकरार है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




