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छठ पूजा 2025: सूर्य देव की आराधना में डूबा भारत – एक सूर्योदय की किरणों से जगमगाती आस्था की कहानी

नई दिल्ली, 27 अक्टूबर 2025 – कल्पना कीजिए, जब सूर्य की पहली किरणें गंगा के तटों को चूमती हैं, तो पूरा भारत एक सुनहरे कैनवास पर रंग भर देता है। ठेकुआ की मिठास हवा में घुली हुई, महिलाओं के व्रत की पवित्रता नदी की लहरों में झलकती हुई, और हर तरफ ‘छठी माईया की जय’ का उद्घोष गूंजता हुआ। छठ पूजा 2025, जो 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक मनाया जा रहा है, न केवल बिहार-यूपी की धरती का महापर्व है, बल्कि अब पूरे भारत का सांस्कृतिक पुल। यह चार दिवसीय यात्रा – नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और ऊषा अर्घ्य – प्रकृति, सूर्य देव और छठी माईया को समर्पित है, जहां व्रतधारी महिलाएं 36 घंटे के निर्जल उपवास से जीवन की हर मनोकामना को सूर्योदय की किरणों में बुनती हैं। इस वर्ष, प्रवासी बिहारियों की बदौलत दिल्ली से मुंबई तक, लखनऊ से पटना तक, छठ का उगता सूरज भारत की एकता का प्रतीक बन गया है। आइए, इस आस्था के सूर्योदय की यात्रा पर चलें, जहां हर घाट एक कविता है और हर ठेकुआ एक प्रार्थना।

भारत भर में छठ की धूम: घाटों पर सूर्य की प्रार्थना, शहरों में सांस्कृतिक संलयन

छठ पूजा का जादू अब सीमाओं से परे फैल चुका है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकलकर यह महापर्व झारखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और यहां तक कि नेपाल के तराई क्षेत्र तक पहुंच गया है। लेकिन 2025 में, शहरीकरण और प्रवासन ने इसे महानगरों का त्योहार बना दिया। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता जैसे शहरों में प्रवासी समुदायों ने नदियों के किनारे अस्थायी घाट बनाए हैं, जहां रंगोली, लाइटिंग और फूलों की मालाओं से सजा हर कोना सूर्य देव का स्वागत करता है।

भारतीय रेलवे ने इस वर्ष 1,500 स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं, ताकि लाखों यात्री अपने घर लौट सकें। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए, कई शहरों में प्लास्टिक-मुक्त घाट बनाए गए हैं। दिल्ली में एमसीडी ने 250 वार्डों में प्रति वार्ड 40,000 रुपये खर्च कर लाइटिंग सुधार की, जबकि मुंबई में झवे पुलिस स्टेशन के पास बने घाट पर 50,000 से अधिक श्रद्धालु जुटे। लखनऊ में लक्ष्मण मेला ग्राउंड के आसपास ट्रैफिक डायवर्जन लागू कर प्रशासन ने सुगमता सुनिश्चित की। पटना में गांधी घाट पर लाखों की भीड़ उमड़ी, जहां ड्रोन शो ने छठ की कहानी को आधुनिक रंग दिया। यह पर्व अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक है – जहां हिंदू-मुस्लिम एक साथ घाट सजाते हैं, और बच्चे छठ गीतों में खो जाते हैं।

लखनऊ: अवध की नगरी में छठ की मधुर वाणी

अवध की तहजीब और छठ की भक्ति का संगम लखनऊ में देखने लायक है। गोमती नदी के किनारे बने घाटों पर महिलाएं साड़ियों में सजीं, ठेकुओं की थालियां थामे, सूर्य को अर्घ्य अर्ढ़ा। इस वर्ष, 27 अक्टूबर को संध्या अर्घ्य के दिन, लक्ष्मण मेला ग्राउंड पर 2 लाख से अधिक श्रद्धालु जुटे। जिला प्रशासन ने 100 से अधिक घाटों पर सीसीटीवी, मेडिकल टीम और लाइफ जैकेट्स की व्यवस्था की।

एक बुजुर्ग व्रतधारी, सुनीता देवी बताती हैं, “लखनऊ में छठ अब अवध के चिकन करी जैसी प्रसिद्ध हो गई। गोमती का पानी शुद्ध हो, इसलिए हम सब मिलकर सफाई अभियान चलाते हैं।” ट्रैफिक डायवर्जन के बावजूद, शहर की सड़कें छठ सामग्री से सजी बाजारों से गूंज रही हैं। ऊषा अर्घ्य के लिए 28 अक्टूबर को सूर्योदय (सुबह 6:15 बजे) का इंतजार, जहां पूरा परिवार प्रार्थना में डूबेगा। लखनऊ का छठ एक कविता है – जहां नवाबी ठाठ और ग्रामीण भक्ति का मेल होता है।

पटना: छठ का मूल गढ़, जहां गंगा की लहरें भक्ति गाती हैं

पटना, छठ का हृदयस्थल, जहां यह पर्व जन्मा माना जाता है। गांधी संथाय घाट पर 27 अक्टूबर को संध्या अर्घ्य के समय लाखों की भीड़ ने सूर्यास्त (शाम 5:50 बजे) को निहारा। बिहार सरकार ने 500 घाटों पर 24 घंटे सुरक्षा, बिजली और शौचालय की व्यवस्था की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद घाट का निरीक्षण किया, और ड्रोन से निगरानी कराई।

यहां छठ गीतों की धुन में पूरा शहर थिरकता है – “उगलो बाबा उगलो, सूरज देव भइया…”। खरना के दिन (26 अक्टूबर) ठेकुआ वितरण से बाजार पटे रहे। एक युवा व्रतधारी, रिया कुमारी कहती हैं, “पटना का छठ परिवार की एकता है। गंगा मां की गोद में हम अपनी मनोकामनाएं बहा देते हैं।” 28 अक्टूबर को ऊषा अर्घ्य के साथ व्रत पालन, और फिर प्रसाद वितरण – पटना का छठ एक जीवंत चित्रकला है, जहां सूर्य की किरणें गंगा को सोने का बना देती हैं।

दिल्ली: राजधानी में प्रवासियों का छठ – यमुना तट पर सूर्योदय का सपना

दिल्ली, जहां बिहारी प्रवासी लाखों की संख्या में बसे हैं, छठ को अपना दूसरा घर बना चुके हैं। यमुना के किनारे बने 100 से अधिक घाटों पर रंगोली और लाइटिंग से सजा माहौल। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 27 अक्टूबर को सरकारी अवकाश घोषित किया, और एमसीडी ने हर वार्ड में लाइटिंग के लिए 40,000 रुपये आवंटित किए।

इंदिरा गांधी स्टेडियम कॉम्प्लेक्स और सराय काले खां घाट पर 50,000 श्रद्धालु जुटे। यहां छठ एक सांस्कृतिक पुल है – जहां दिल्ली की भागदौड़ रुक जाती है, और व्रतधारी महिलाएं यमुना की लहरों में अर्घ्य चढ़ाती हैं। सूर्योदय (6:10 बजे) और सूर्यास्त (5:45 बजे) के समय ड्रोन शो ने आकाश को रोशन किया। एक प्रवासी, अजय सिंह कहते हैं, “दिल्ली में छठ हमें घर की याद दिलाता है। यमुना गंगा की छोटी बहन लगती है।” दिल्ली का छठ आधुनिकता और परंपरा का संगम है।

मुंबई: समुद्र तट पर छठ की लहरें – मायानगरी में भक्ति का सूर्योदय

मुंबई, जहां सपनों की नगरी में छठ का सूरज चमकता है। झवे पुलिस स्टेशन के पास बने अस्थायी घाट पर 50,000 से अधिक बिहारी समुदाय ने संध्या अर्घ्य चढ़ाया। महाराष्ट्र सरकार ने समुद्र तटों पर सुरक्षा बढ़ाई, और प्लास्टिक-मुक्त अभियान चलाया। यहां छठ सामग्री की दुकानें दादर से लेकर बोरीवली तक सजी हैं।

27 अक्टूबर को शाम 6:00 बजे सूर्यास्त के समय ठेकुआ थालियां समुद्र को अर्घ्य। महिलाएं साड़ियों में सजीं, बच्चे छठ गीत गाते। एक व्रतधारी, मीना देवी बताती हैं, “मुंबई की भागमभाग में छठ हमें शांति देता है। अरब सागर की लहरें छठी माईया का आशीर्वाद लगता है।” 28 अक्टूबर को ऊषा अर्घ्य के साथ प्रसाद, और फिर शहर की जिंदगी पटरी पर। मुंबई का छठ एक बॉलीवुड गीत जैसा है – रंगीन, भावुक और अविस्मरणीय।

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Author: saryusandhyanews

SENIOR JOURNALIST

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