इस्लामाबाद/वाशिंगटन, 12 अप्रैल 2026 — अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया युद्ध को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में आयोजित 21 घंटे की मैराथन शांति वार्ता पूरी तरह विफल हो गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने कहा कि ईरान ने अमेरिका की शर्तें स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जबकि ईरानी पक्ष ने अमेरिका पर अत्यधिक और अवैध मांगें रखने का आरोप लगाया।
वार्ता की असफलता के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अमेरिका हॉर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉकेड कर देगा। इस क्षेत्र से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
वार्ता क्यों फेल हुई?
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस कर रहे थे। उनके साथ ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकोफ और दामाद जायर्ड कुश्नर भी शामिल थे। ईरानी पक्ष का नेतृत्व संसदीय स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने किया।
जे.डी. वेंस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमने अच्छे विश्वास के साथ बातचीत की, लेकिन ईरान ने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। यह ईरान के लिए अमेरिका से ज्यादा बुरी खबर है। हमने अपना अंतिम और सर्वश्रेष्ठ ऑफर दिया है।”
ईरानी मीडिया और अधिकारियों ने दावा किया कि अमेरिका ने परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह छोड़ने और अन्य कठोर शर्तों पर जोर दिया, जिसे ईरान स्वीकार नहीं कर सका। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर विश्वास की कमी का आरोप लगा रहे हैं।
पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका पर उठे सवाल
पाकिस्तान ने इन वार्ताओं की मेजबानी की और खुद को प्रमुख मध्यस्थ के रूप में पेश किया था। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने दोनों पक्षों से अलग-अलग बैठकें कीं। पाकिस्तान ने दो सप्ताह के सीजफायर को ब्रोकर करने का श्रेय भी लिया था।
हालांकि, कई विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक पाकिस्तान को उपयुक्त मध्यस्थ नहीं मानते। मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमा पर तनाव, बलूचिस्तान में आतंकवाद और सांप्रदायिक मुद्दे लंबे समय से चले आ रहे हैं।
- पाकिस्तान अमेरिका का पुराना सहयोगी रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में चीन और ईरान के साथ उसके बढ़ते संबंधों को लेकर वाशिंगटन में अविश्वास है।
- पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट के कारण उसकी मध्यस्थता की विश्वसनीयता पर संदेह जताया जा रहा है।
- ईरान और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के बीच तटस्थ मध्यस्थ की जरूरत थी, जबकि पाकिस्तान को दोनों पक्षों के साथ पूर्वाग्रह वाला माना जाता है।
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता से वार्ता की शुरुआत में कुछ उम्मीद जगी थी, लेकिन गहरे अविश्वास और जटिल मुद्दों (खासकर ईरान का परमाणु कार्यक्रम) के कारण यह विफल हो गई।
आगे क्या?
वार्ता की असफलता के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका है। ट्रंप प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए सैन्य विकल्पों पर जोर दिया है। ईरान ने भी चेतावनी दी है कि वह किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।
पाकिस्तान ने कहा है कि वह शांति प्रयासों में अपनी भूमिका जारी रखेगा, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कोई और तटस्थ देश (जैसे ओमान, तुर्की या चीन) आगे मध्यस्थता कर सकता है।
यह घटना दिखाती है कि लंबे समय से चले आ रहे अमेरिका-ईरान शत्रुत्व को खत्म करना कितना कठिन है। दुनिया अब ट्रंप के अगले कदम और क्षेत्रीय सुरक्षा पर नजरें टिकाए हुए है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




