नई दिल्ली। बच्चों और नाबालिगों की सोशल मीडिया तक पहुंच और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण रुख अपनाया। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि नाबालिगों को सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मौजूद हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए क्या प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था और तकनीकी ‘फायरवॉल’ उपलब्ध है। यह मामला एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान सामने आया।
बच्चों के लिए डिजिटल सुरक्षा पर जोर
याचिका में नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक अथवा कड़े नियंत्रण की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सोशल मीडिया अकाउंट बनाते समय प्लेटफॉर्म की शर्तों को स्वीकार करना एक तरह का अनुबंध है, जबकि कानून के तहत नाबालिगों की संविदात्मक क्षमता सीमित है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए केंद्र का पक्ष जानना जरूरी माना। अदालत के समक्ष उम्र की पुष्टि (age verification), अभिभावकीय सहमति और बच्चों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं।
ऑनलाइन खतरों से बचाव बड़ी चुनौती
इंटरनेट पर बच्चों को साइबरबुलिंग, अनुचित सामग्री, ऑनलाइन शोषण, साइबर अपराध और निजता से जुड़े जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। नीति आयोग ने भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए इन खतरों और डिजिटल जागरूकता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है।
सरकार के मौजूदा नियमों पर भी नजर
केंद्र सरकार ने बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 में प्रावधान किए हैं। सरकार के अनुसार, बच्चों के डेटा के प्रसंस्करण के लिए सत्यापित अभिभावकीय सहमति और बच्चों की ट्रैकिंग तथा लक्षित विज्ञापन पर रोक जैसे सुरक्षा उपाय शामिल हैं।
आगे क्या होगा?
अब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि मौजूदा कानून और तकनीकी व्यवस्था बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित खतरों से किस तरह बचाती है और क्या अतिरिक्त सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह पहल बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, अदालत ने अभी सोशल मीडिया पर नाबालिगों के लिए कोई अंतिम प्रतिबंध लागू नहीं किया है; फिलहाल केंद्र से जवाब मांगा गया है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST


