महिला सशक्तिकरण और भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका
लेखिका: श्रीमती सविता वर्मा
सलाहकार, एसएसएन नेटवर्क उत्तर प्रदेश (शिक्षा)
एवं निदेशक, जीडीडी कॉलेज, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश, भारत
महिला सशक्तिकरण किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार स्तंभ है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी न केवल समानता का प्रतीक है, बल्कि सुशासन, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की कुंजी भी है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान तक भारतीय महिलाओं ने राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, किंतु अभी भी पूर्ण प्रतिनिधित्व की राह में कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान ने महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार दिए। स्वतंत्रता संग्राम में सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, कस्तूरबा गांधी जैसी महिलाओं ने नेतृत्व किया। 1952 में पहली लोकसभा में केवल 22 महिला सांसद थीं (लगभग 4.5 प्रतिशत)। समय के साथ यह संख्या बढ़ी। 2019 में 17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसद (14.4 प्रतिशत) पहुँचीं, जो अब तक का सर्वोच्च आंकड़ा था। 2024 के आम चुनावों में 18वीं लोकसभा में 74 महिला सांसद चुनी गईं, जो कुल 543 सदस्यों का लगभग 13.6 से 14 प्रतिशत है।
वर्तमान आंकड़े: प्रगति और चुनौतियाँ
एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, देशभर के मौजूदा लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कुल उम्मीदवारों में महिला उम्मीदवार केवल 10 प्रतिशत थीं। कुल सांसदों और विधायकों (4,666) में से केवल 464 यानी लगभग 10 प्रतिशत महिलाएँ हैं।
- लोकसभा: 74 महिला सांसद (लगभग 14 प्रतिशत)। पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 11, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में 7-7 महिला सांसद हैं।
- राज्य विधानसभाएँ: 4,123 विधायकों में से 390 महिला विधायक (लगभग 9 प्रतिशत)। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 47, पश्च पश्चिम बंगाल में 40 महिला विधायक हैं।
- मंत्रिमंडल: राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्रिमंडलों में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 9.9 प्रतिशत है। केंद्र सरकार में यह आंकड़ा और भी कम है।
- पंचायती राज संस्थाएँ: यहाँ स्थिति बेहतर है। लगभग 14.5 लाख महिलाएँ चुनी गई प्रतिनिधि हैं, जो कुल प्रतिनिधित्व का करीब 46 प्रतिशत है। कई राज्यों में 50 प्रतिशत आरक्षण लागू है।
वैश्विक स्तर पर संसद में महिलाओं की औसत भागीदारी लगभग 27.5 प्रतिशत है, जबकि भारत इस मामले में काफी पीछे है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम और भविष्य की राह
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है। यह आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा। यह ऐतिहासिक कदम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को निर्णायक रूप से बढ़ाएगा।
महिलाओं की उपलब्धियाँ और नेतृत्व
भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, जयललिता, मायावती, निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी जैसी महिलाओं ने उच्च पदों पर अपनी क्षमता साबित की है। आज महिलाएँ न केवल सांसद और विधायक हैं, बल्कि मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्री के रूप में भी सक्रिय हैं। स्थानीय स्तर पर महिला सरपंचों ने विकास कार्यों, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
चुनौतियाँ
राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को टिकट देने में हिचकिचाहट, परिवारिक जिम्मेदारियाँ, वित्तीय संसाधनों की कमी, सामाजिक रूढ़ियाँ और हिंसा की आशंका प्रमुख बाधाएँ हैं। कई बार आरक्षण के बावजूद महिलाएँ केवल एक कार्यकाल तक ही सक्रिय रह पाती हैं।
महिला सशक्तिकरण केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाकर ही सच्ची नारी शक्ति का निर्माण संभव है। भारत की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है। जब महिलाएँ निर्णय लेने की प्रक्रिया में पूर्ण भागीदार बनेंगी, तभी ‘विकसित भारत 2047’ का सपना साकार होगा।
पंचायत स्तर की सफलता को संसद और विधानसभाओं तक पहुँचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना न केवल उनका अधिकार है, बल्कि राष्ट्र की प्रगति का अनिवार्य मार्ग भी है।
श्रीमती सविता वर्मा
सलाहकार, एसएसएन नेटवर्क उत्तर प्रदेश (शिक्षा)
निदेशक, जीडीडी कॉलेज, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
Author: saryusandhyanews
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