क्यों दुनिया के नेता और विशेषज्ञ पीएम मोदी को ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष का सबसे बेहतर मध्यस्थ मानते हैं? विस्तृत विश्लेषण-अजय कुमार पांडे, एसएसएन नेटवर्क के मुख्य संपादक-
नई दिल्ली, 12 मार्च 2026: ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध ने पूरे मिडिल ईस्ट को आग की चपेट में ले लिया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद, ओमान के सलालाह बंदरगाह पर ईरानी मिसाइल हमला और तेल की कीमतों में उछाल के बीच दुनिया एक ऐसे नेता की तलाश में है जो तीनों पक्षों के बीच विश्वसनीय मध्यस्थता कर सके। और कई प्रमुख विशेषज्ञों तथा विश्व नेताओं का मानना है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त हैं।
1. भारत की ‘बैलेंस्ड डिप्लोमेसी’ – दोनों पक्षों का भरोसा
भारत ने हमेशा ‘नॉन-अलाइनमेंट’ की नीति अपनाई है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने इजरायल के साथ ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ बनाई है (फरवरी 2026 में मोदी की इजरायल यात्रा में 27 समझौते हुए)। वहीं ईरान के साथ भी पुराने संबंध बरकरार हैं – चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट, तेल आयात और सांस्कृतिक संबंध।
अमेरिका के पूर्व कर्नल डगलस मैकग्रेगर ने हाल ही में टकर कार्लसन शो में कहा: “हमें एक मध्यस्थ की जरूरत है जो समस्या का हिस्सा न हो। मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि राष्ट्रपति ट्रंप पीएम मोदी को फोन करें। मोदी का इजरायल से अच्छा संबंध है, ईरान से भी अच्छा संबंध है और वे कभी ईरानी लोगों के दुश्मन नहीं रहे।”
2. UAE के पूर्व राजदूत का ‘एक फोन कॉल’ वाला बयान
यूनाइटेड अरब अमीरात के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्ज़ा ने कहा: “पीएम मोदी का इजरायल और ईरान दोनों के साथ एक फोन कॉल युद्ध रोक सकता है। भारत की दोनों देशों के साथ मजबूत व्यापारिक और राजनयिक संबंध हैं। मोदी गल्फ देशों में भी बहुत सम्मानित हैं।”
यह बयान कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन गया है।
3. मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति और विश्वसनीयता
- पीएम मोदी ने हाल ही में इजरायल के पीएम नेतन्याहू से फोन पर बात की और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया।
- उन्होंने कनाडा, फिनलैंड और अन्य नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा – “सैन्य संघर्ष किसी समस्या का समाधान नहीं है। हम संवाद और कूटनीति के पक्ष में हैं।”
- भारत ने ईरान के साथ भी बैकचैनल संपर्क बनाए रखा है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में विशेषज्ञ लिख रहे हैं कि “मोदी ही एकमात्र नेता हैं जो तीनों पक्षों का सम्मान हासिल करते हैं और किसी का पक्ष नहीं लेते।”
4. भारत पर युद्ध का सीधा असर – प्रेरणा भी, दबाव भी
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। होर्मुज बंदी और सलालाह हमले से LPG संकट, पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव जैसे पड़ोसी देश भी भारत से ऊर्जा मदद मांग रहे हैं। इसलिए मोदी सरकार शांति की सबसे बड़ी पक्षधर है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी नेता के देश पर खुद संकट का असर पड़ रहा हो, तो वह निष्पक्ष और प्रभावी मध्यस्थ बन सकता है।
5. मोदी की वैश्विक छवि: ‘विश्व मित्र’ (Vishwa Mitra)
- रूस-यूक्रेन युद्ध में मोदी ने दोनों पक्षों से बात की और गेहूं निर्यात में मदद की।
- G20 में भारत ने ‘वसुदैव कुटुंबकम’ का मंत्र दिया।
- अब मिडिल ईस्ट में भी भारत को ‘न्यूट्रल मीडिएटर’ के रूप में देखा जा रहा है।
जेरूसलम स्ट्रैटेजिक ट्रिब्यून ने लिखा: “यदि इजरायल-ईरान टकराव बढ़ा तो सबसे विश्वसनीय मध्यस्थ न बीजिंग, मॉस्को या वाशिंगटन से, बल्कि नई दिल्ली से आ सकता है।”
क्या होगा अगर मोदी मध्यस्थता करें?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि मोदी का एक फोन कॉल या दिल्ली में त्रिपक्षीय बैठक युद्धविराम का रास्ता खोल सकती है। ईरान को भी भारत पर भरोसा है क्योंकि भारत कभी भी ईरान पर प्रतिबंधों का समर्थन नहीं करता। इजरायल को मोदी का ‘भाई’ वाला रिश्ता याद है। अमेरिका को भी भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका पसंद है।
निष्कर्ष: 2026 का ‘पीस मेकर’
ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध ने दुनिया को अस्थिर कर दिया है। ऐसे में पीएम मोदी की ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाली कूटनीति अब वैश्विक स्तर पर ‘सबका साथ, सबकी शांति’ बन गई है। दुनिया के नेता और विशेषज्ञ यही सोच रहे हैं कि अगर कोई इस आग को बुझा सकता है, तो वह नरेंद्र मोदी ही हैं।
स्थिति बहुत संवेदनशील है। अगर मोदी इस भूमिका को स्वीकार करते हैं तो भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा नई ऊंचाइयों पर पहुंच सकती है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




