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“संख्या अधिक, पर भूगोल सीमा तय करता है”: वायु सेना प्रमुख एपी सिंह ने समझाया तिब्बत और हिमालय में भारत को क्यों हासिल है रणनीतिक बढ़त

नई दिल्ली:भारतीय वायु सेना (IAF) के प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह (एपी सिंह) ने चीन की वायु सेना (PLAAF) के बड़े बेड़े और भारत के रणनीतिक फायदों को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। वायु सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि हालांकि संख्याबल के मामले में चीन के पास भारत की तुलना में अधिक लड़ाकू विमान (Fighter Jets) मौजूद हैं, लेकिन तिब्बत के पठार (Tibetan Plateau) की अत्यधिक ऊंचाई और हिमालयी क्षेत्र का भूगोल चीनी जेट विमानों की परिचालन क्षमताओं (Operational Limitations) को काफी हद तक सीमित कर देता है।

1. पतली हवा और अत्यधिक ऊंचाई: चीन के लिए प्राकृतिक चुनौती

वायु सेना प्रमुख ने बताया कि केवल लड़ाकू विमानों की संख्या अधिक होने से युद्ध के मैदान में सीधी जीत तय नहीं होती। तिब्बती पठार पर बने चीनी एयरबेस समुद्र तल से अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित हैं।

  • कम पेलोड और ईंधन क्षमता: अत्यधिक ऊंचाई पर हवा का दबाव (Air Density) काफी कम होता है। इस कारण चीनी लड़ाकू विमान (जैसे J-10, J-11, J-16 और J-20) जब तिब्बत के एयरबेस से उड़ान भरते हैं, तो उन्हें पेलोड (हथियार और मिसाइलें) तथा ईंधन की मात्रा में भारी कटौती करनी पड़ती है।

  • उड़ान भरने में कठिनाई: कम एयर डेंसिटी के कारण विमानों को टेक-ऑफ के दौरान पूरी ताकत लगाने में चुनौती आती है, जिससे उनकी मारक क्षमता और कॉम्बैट रेडियस (रेंज) घट जाती है।

2. भारतीय वायु सेना (IAF) को क्यों हासिल है भौगोलिक लाभ?

इसके विपरीत, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास स्थित अधिकांश भारतीय एयरबेस (जैसे अंबाला, बरेली, हाशिमारा, और तेज़पुर) निचले मैदानी या मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में स्थित हैं।

  • फुल लोड के साथ टेक-ऑफ: भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान (जैसे सुखोई Su-30MKI, राफेल, और मिराज 2000) अपने पूरे ईंधन भंडार और भारी हथियार प्रणालियों (जैसे ब्रह्मोस, स्कैल्प और मिटियोर मिसाइल) के साथ आसानी से उड़ान भर सकते हैं।

  • त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता: निचले इलाकों से उड़ान भरने के कारण भारतीय जेट तुरंत अपनी अधिकतम रेंज और गति पर पहाड़ों की घाटियों का लाभ उठाते हुए हमला करने में सक्षम हैं।

3. “संख्याबल से अधिक मायने रखता है एकीकरण और प्रशिक्षण”

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक हवाई युद्ध में केवल विमानों का आंकड़ा ही निर्णायक नहीं होता।

“विमानों की कुल संख्या किसी वायु सेना की पूरी ताकत का निर्धारण नहीं करती। पायलटों का उन्नत प्रशिक्षण, परिचालन अनुभव, रडार एकीकरण, त्वरित निर्णय क्षमता और नेट-सेंट्रिक वॉरफेयर में समन्वय ही अंतिम जीत तय करता है।”

उन्होंने हालिया सैन्य अभियानों (जैसे ऑपरेशन सिंदूर) का उदाहरण देते हुए कहा कि तीनों सेनाओं के बीच केंद्रीय नियंत्रण और त्वरित परिसंपत्ति आवंटन ने आधुनिक युद्ध में वायु शक्ति की निर्णायक भूमिका को साबित किया है।

भारत की भावी रणनीति: थियेटराइजेशन और स्वदेशीकरण

चीन और पाकिस्तान की ओर से मिलने वाली दोहरी चुनौती का मुकाबला करने के लिए भारतीय वायु सेना अपनी मारक क्षमता और नेटवर्क क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रही है।

  • थियेटराइजेशन मॉडल: वायु सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि भारत के सुरक्षा मॉडल के अनुसार लड़ाकू विमानों का कोई स्थायी भौगोलिक विभाजन नहीं किया जाएगा, बल्कि आवश्यकतानुसार त्वरित तैनाती (“केंद्रीय नियंत्रण और विकेंद्रीकृत निष्पादन”) की रणनीति अपनाई जाएगी।

  • स्वदेशी 5वीं पीढ़ी का प्रोजेक्ट (AMCA): चीन की 5वीं पीढ़ी के J-20 विमानों की बढ़ती तैनाती के बीच भारत अपने AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) और तेजस Mk-1A/Mk-2 प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा करने में जुटा है।

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Author: saryusandhyanews

SENIOR JOURNALIST

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