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“मंदिर की जमीन देवता की है, सरकार उसकी मालिक नहीं हो सकती”: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की संपत्तियों और उनके मालिकाना हक को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि राज्य सरकारें या उनके अधिकारी किसी मंदिर की संपत्ति के केवल संरक्षक (Custodian) और नियामक (Regulator) हैं, उसके स्वामी (Owner) नहीं। अदालत ने कहा कि सरकार मंदिर की संपत्तियों को अपनी मर्जी से हथिया नहीं सकती और न ही किसी ट्रस्टी से उपहार (Gift) के तौर पर ऐसी जमीन ले सकती है, भले ही उस जमीन का उपयोग किसी सार्वजनिक हित या सरकारी परियोजना के लिए ही क्यों न किया जा रहा हो।

 क्या है पूरा मामला?

यह पूरा कानूनी विवाद तमिलनाडु के इरोड जिले के कोडुमुडी गांव स्थित नागापलायम मरियम्मन-पोननाचियम्मन मंदिर से जुड़ा है।

  • अगस्त 2017 में मंदिर के एक अस्थाई ट्रस्टी ने मंदिर की लगभग 1 एकड़ 10 सेंट ‘इनाम भूमि’ (जो देवता के रखरखाव के लिए दी गई थी) को एक सरकारी कार्यालय (तालुक ऑफिस) के निर्माण के लिए तमिलनाडु सरकार को ‘गिफ्ट डीड’ (दान पत्र) के जरिए सौंप दिया था।

  • इस हस्तांतरण को स्थानीय भक्तों और याचिकाकर्ताओं ने मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मार्च 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने इस ट्रांसफर को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

 सुप्रीम कोर्ट की बेंच की मुख्य टिप्पणियां

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अलोक अराधे की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए उपहार विलेख (Gift Deed) को अवैध और अमान्य करार दिया। अदालत ने अपने फैसले में निम्नलिखित अहम बातें कहीं:

  1. संपत्ति देवता में निहित होती है: अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई संपत्ति किसी देवता या धार्मिक संस्था को दान कर दी जाती है, तो वह दानदाता, पुजारी, ट्रस्टी या राज्य की निजी संपत्ति नहीं रह जाती, बल्कि उसका स्वामित्व सीधे देवता में निहित हो जाता है।

  2. प्रबंधक या ट्रस्टी मालिक नहीं होता: मंदिर की देखरेख करने वाला कोई भी ट्रस्टी या पुजारी उसका मालिक नहीं होता। उसे पद पर रहने का अधिकार भले ही हो, लेकिन वह मंदिर की संपत्ति को मनमाने ढंग से किसी को दान में देने या बांटने का अधिकार नहीं रखता।

  3. सार्वजनिक उद्देश्य भी अधिकार नहीं देता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही जमीन का उपयोग किसी अच्छे या सार्वजनिक काम (जैसे सरकारी दफ्तर बनाना) के लिए किया जा रहा हो, लेकिन इसके नाम पर मंदिर की संपत्ति का इस तरह अधिग्रहण या उपहार स्वीकार करना कानूनन गलत है।

 सरकार पर जुर्माना और किराए का आदेश

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया, लेकिन जमीन पर पहले से बने तालुक कार्यालय (सरकारी दफ्तर) को गिराने या हटाने का आदेश नहीं दिया ताकि जनहित का काम बाधित न हो। इसके बदले अदालत ने कड़ा निर्देश दिया कि:

  • राज्य सरकार अब इस जमीन का उपयोग मुफ्त में नहीं कर सकती। सरकार को मंदिर को ₹31,000 प्रति माह की दर से किराया देना होगा।

  • यह किराया 8 मार्च 2019 से लागू माना जाएगा और इसका पूरा बकाया चुकाना होगा।

  • इसके अलावा, अदालत ने तमिलनाडु सरकार पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया है, जिसे मंदिर के फंड में जमा करना होगा।

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Author: saryusandhyanews

SENIOR JOURNALIST

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