तेहरान/दुबई। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अमेरिका जून में हुए अंतरिम समझौते की शर्तों को पूरा नहीं करता, तब तक रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की स्थिति नहीं बनेगी। ईरानी संसद के अध्यक्ष और शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बाकेर कालीबाफ ने मंगलवार को यह रुख सामने रखा।
अमेरिका के सामने रखी गईं प्रमुख शर्तें
ईरान के अनुसार होर्मुज को फिर से खोलने के लिए अमेरिका को कई कदम उठाने होंगे। इनमें ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए समुद्री अवरोध को हटाना, तेल संबंधी प्रतिबंधों को समाप्त करना, विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना तथा ईरान के खिलाफ सैन्य धमकियों और अभियानों को रोकना शामिल है।
ईरानी पक्ष का कहना है कि जून में हुआ समझौता व्यापक बातचीत की दिशा में एक अंतरिम व्यवस्था थी, लेकिन बाद में अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण और अन्य मुद्दों पर मतभेद बढ़ गए।
ट्रंप के बयान के बाद बढ़ा तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जुलाई में कहा था कि समझौता समाप्त हो चुका है। इसके बाद ईरान ने भी समझौते को निलंबित करने की घोषणा की। 60 दिनों की बातचीत की अवधि समाप्त होने के बावजूद दोनों पक्षों के बीच कोई व्यापक अंतिम समझौता नहीं हो सका है।
ईरान के इस ताजा रुख से अमेरिका-ईरान कूटनीतिक प्रयासों पर दबाव और बढ़ गया है। वहीं अमेरिकी पक्ष ने भी ईरान पर दबाव बनाए रखने का संकेत दिया है।
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर असर
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने से कच्चे तेल और एलएनजी की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। रॉयटर्स के अनुसार संकट के दौरान इस मार्ग से तेल की आवाजाही युद्ध से पहले के लगभग 1.8 करोड़ बैरल प्रतिदिन से घटकर करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन तक आ गई है।
इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया, जिससे भारत समेत तेल आयात करने वाले देशों की चिंता बढ़ सकती है।
भारत समेत एशियाई देशों की नजर
होर्मुज संकट का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आयात करने वाले भारत सहित एशियाई देशों के लिए यह जलमार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक समुद्री यातायात बाधित रहने पर तेल की कीमत, शिपिंग लागत और आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।
एसएसएन इंटरनेशनल डेस्क: ईरान के ताजा बयान से स्पष्ट है कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब अमेरिका-ईरान विवाद में महज समुद्री मार्ग का मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक कूटनीतिक और आर्थिक दबाव का प्रमुख केंद्र बन गया है। यदि दोनों देशों के बीच शीघ्र समझौता नहीं होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




