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एस. श्रीजीत के विदेश यात्रा मामले में केरल हाईकोर्ट का रुख, आदेश को लेकर बढ़ी चर्चा

कोच्चि। केरल हाईकोर्ट में एस. श्रीजीत से जुड़े विदेश यात्रा संबंधी मामले को लेकर कानूनी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज है। हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में इस नाम से जुड़े जिस मामले की स्पष्ट जानकारी मिलती है, उसमें एस. श्रीजीत वी.एस. को केरल सरकार की ओर से सरकारी वकील के रूप में दर्ज किया गया है। इसलिए मामले की पहचान को लेकर सावधानी जरूरी है।

केरल हाईकोर्ट के एक मामले में याचिकाकर्ता ने विदेश में नौकरी करने के कारण पासपोर्ट नवीनीकरण की मांग की थी। अदालत के समक्ष यह बताया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है और वह विदेश में होने के कारण भारत आकर संबंधित अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हो पा रहा था। अदालत ने संबंधित भारतीय दूतावास से कानून के अनुसार Emergency Certificate जारी करने की व्यवस्था करने का निर्देश दिया, ताकि याचिकाकर्ता भारत आकर न्यायिक प्रक्रिया में शामिल हो सके।

विदेश यात्रा और लंबित आपराधिक मामलों पर अदालत की भूमिका

विदेश यात्रा से जुड़े मामलों में अदालतें आम तौर पर यह देखती हैं कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक मामला, वारंट या न्यायिक कार्यवाही लंबित तो नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को विदेश यात्रा की अनुमति या पासपोर्ट संबंधी राहत दी जाती है, तो अदालत आवश्यक शर्तें भी लगा सकती है ताकि वह जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया से बच न सके।

केरल हाईकोर्ट के उक्त आदेश में भी अदालत ने सीधे तौर पर पासपोर्ट नवीनीकरण की अनुमति देने के बजाय संबंधित दूतावास के माध्यम से आपातकालीन यात्रा प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का रास्ता अपनाया।

एस. श्रीजीत के संदर्भ में तथ्य स्पष्ट करना जरूरी

एस. श्रीजीत नाम से केरल में कई अधिकारी और अन्य व्यक्ति जुड़े हो सकते हैं। उपलब्ध विश्वसनीय रिकॉर्ड में एस. श्रीजीत को केरल के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के रूप में भी दर्ज किया गया है। एक सड़क सुरक्षा रिपोर्ट में उनके द्वारा केरल की सड़क सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित प्रश्नावली का उत्तर दिए जाने का उल्लेख है।

इसलिए यदि यह समाचार किसी विशेष एस. श्रीजीत की विदेश यात्रा, पासपोर्ट, भ्रष्टाचार/आपराधिक मामले या केरल हाईकोर्ट के हालिया आदेश से संबंधित है, तो मामले की सही पहचान के लिए केस नंबर या आदेश की तारीख आवश्यक होगी। बिना इसकी पुष्टि के किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।

एसएसएन विशेष: न्यायालय से जुड़े मामलों में आरोप और न्यायिक निष्कर्ष के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी याचिका में आरोप लगाए जाने मात्र से वे सिद्ध तथ्य नहीं बन जाते।

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Author: saryusandhyanews

SENIOR JOURNALIST

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