भारतीय सशस्त्र बलों (थल सेना, नौसेना और वायु सेना) में महिलाओं की भूमिका पिछले कुछ दशकों में नाटकीय रूप से विकसित हुई है। पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्र माने जाने वाले रक्षा क्षेत्र में महिलाएँ अब न केवल सहायक भूमिकाओं में, बल्कि परिचालन, नेतृत्व और रणनीतिक पदों पर सक्रिय रूप से योगदान दे रही हैं। यह बदलाव लैंगिक समानता, न्यायिक हस्तक्षेप और नीतिगत सुधारों का परिणाम है। वर्तमान में सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों की संख्या 2014 के लगभग 3,000 से बढ़कर 2026 में 11,000 से अधिक हो चुकी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
महिलाओं का सैन्य सेवा में प्रवेश 1888 में सैन्य नर्सिंग सेवा (Military Nursing Service) के माध्यम से हुआ। 1958 में भारतीय सेना मेडिकल कोर में महिला डॉक्टर शामिल हुईं। स्वतंत्रता के बाद शुरू में उनकी भूमिका मुख्यतः चिकित्सा, नर्सिंग, प्रशासनिक और कानूनी क्षेत्रों तक सीमित थी।
1990 के दशक में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के माध्यम से महिलाओं की भर्ती बढ़ी। 2019-2020 में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों ने स्थायी कमीशन (Permanent Commission) और समान अवसर प्रदान किए। 2021 में थल सेना में पहली बार महिला सिपाहियों (Agniveers) की भर्ती हुई, और 2025 में नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) में महिलाओं का प्रवेश ऐतिहासिक रहा। 30 मई 2025 को 17 महिला कैडेट्स NDA की पासिंग आउट परेड में शामिल हुईं।
वर्तमान भूमिका और उपलब्धियाँ
आज महिलाएँ तीनों सेनाओं में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभा रही हैं:
- थल सेना: हजारों महिला अधिकारी विभिन्न कोर में कार्यरत हैं। वे अब कमांड पदों पर तैनात हो रही हैं। 2021 में मिलिट्री पुलिस में पहली बार 83 महिला सिपाहियाँ शामिल हुईं। ऑपरेशन सिंदूर जैसी महत्वपूर्ण कार्रवाइयों में कर्नल सोफिया कुरैशी जैसी महिला अधिकारी नेतृत्व कर चुकी हैं।
- वायु सेना: महिला पायलट्स और नेविगेटर्स सक्रिय रूप से सेवा दे रही हैं। 2018 में महिला अधिकारी 13.09% थीं। अब वे फाइटर पायलट्स के रूप में भी योगदान दे रही हैं।
- नौसेना: 2023 में 273 महिला Agniveers शामिल हुईं। महिला अधिकारी जहाजों पर और परिचालन भूमिकाओं में तैनात हैं।
महिलाएँ अब लड़ाकू सहायक भूमिकाओं (Combat Support) में सक्रिय हैं। 2025 में 11 महिला अधिकारियों (तीनों सेवाओं से) ने ट्रिवेणी जहाज पर 1,800 समुद्री मील की यात्रा पूरी की, जो संयुक्त सेवा समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
महिलाएँ विविधता लाती हैं — बेहतर निर्णय लेना, मल्टीटास्किंग, संवेदनशीलता और समुदायों के साथ विश्वास निर्माण में उनकी भूमिका सराहनीय है।
चुनौतियाँ
महिलाओं की प्रगति के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
- शारीरिक और प्रशिक्षण संबंधी: युद्ध भूमिकाओं (Infantry, Armoured) में उच्च शारीरिक सहनशक्ति की आवश्यकता होती है। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग मानक विवादास्पद रहे हैं।
- सांस्कृतिक और सामाजिक पूर्वाग्रह: सशस्त्र बलों में ग्रामीण पृष्ठभूमि के कर्मियों में पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं की सोच प्रबल है। स्वीकार्यता अभी भी चुनौती है।
- कार्य-जीवन संतुलन: गर्भावस्था, प्रसवोत्तर देखभाल, मातृत्व और परिवार की जिम्मेदारियाँ। लंबी तैनातियाँ और कठिन परिस्थितियाँ महिलाओं के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।
- यौनिक उत्पीड़न और सुरक्षा: कार्यस्थल पर सुरक्षा और समान व्यवहार सुनिश्चित करना बाकी है।
- सीमित लड़ाकू भूमिकाएँ: इन्फैंट्री, आर्मर्ड और मेकनाइज्ड यूनिट्स में पूर्ण लड़ाकू भूमिकाएँ अभी सीमित हैं। कुल अधिकारियों में महिलाओं का प्रतिशत अभी भी 7% से कम है।
भविष्य की संभावनाएँ
भविष्य आशाजनक है। NDA में महिलाओं का नियमित प्रवेश, Agniveer योजना में बढ़ती भागीदारी और कमांड पदों पर बढ़ता प्रतिनिधित्व सकारात्मक संकेत हैं।
- नीतिगत सुधार: और अधिक लड़ाकू भूमिकाओं का खुलना, लिंग-तटस्थ भर्ती और नेतृत्व प्रशिक्षण।
- प्रौद्योगिकी का योगदान: आधुनिक युद्ध में ड्रोन, साइबर और टेक्नोलॉजी आधारित भूमिकाएँ महिलाओं के लिए नए अवसर खोलेंगी।
- लक्ष्य: 2030 तक महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना और पूर्ण समानता सुनिश्चित करना।
- राष्ट्रीय महत्व: महिलाओं की भागीदारी न केवल समानता का प्रतीक है, बल्कि रक्षा क्षमता को मजबूत करती है। विविधता से बेहतर निर्णय लेने और नवाचार होता है।
भारत सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सशस्त्र बलों के प्रयासों से महिलाएँ “नारी शक्ति” को सैन्य क्षेत्र में भी सशक्त बना रही हैं। कर्नल सोफिया कुरैशी, विंग कमांडर व्योमिका सिंह और अन्य अग्रणी महिलाएँ प्रेरणा स्रोत हैं।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




