नई दिल्ली, 10 मार्च 2026: मध्य पूर्व युद्ध के बीच वैश्विक आर्थिक अस्थिरता से जूझते भारत ने आज एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे सीमावर्ती देशों से आने वाले विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के लिए सख्त नियमों में ढील दी है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद लागू ‘प्रेस नोट 3’ के तहत इन देशों के निवेश पर अनिवार्य सरकारी मंजूरी की शर्त को अब उद्योग-विशेष के आधार पर शिथिल किया जाएगा। यह फैसला आर्थिक विकास को गति देने और ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूत करने का प्रयास है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सतर्कता बरतने के निर्देश भी दिए गए हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “यह कदम भारत को वैश्विक निवेश गंतव्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।”
पृष्ठभूमि: प्रेस नोट 3 से नई नीति तक का सफर
2020 में लद्दाख गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा तनाव के बाद सरकार ने प्रेस नोट 3 जारी किया था, जिसमें सीमावर्ती देशों (जिनमें चीन प्रमुख है) से आने वाले सभी FDI के लिए केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी अनिवार्य कर दी गई। इस नीति के तहत चीनी कंपनियों जैसे वीवो, शाओमी और टिकटॉक के निवेश पर सख्ती बरती गई, जिससे कई प्रोजेक्ट रुके। लेकिन पिछले दो वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर को पार कर गया, और चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया।
आज की कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसले के अनुसार, अब छोटे निवेश (दे मिनिमिस थ्रेशोल्ड) पर स्वत: मंजूरी मिल सकेगी। रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और टेलीकॉम जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में मंजूरी जरूरी रहेगी, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में प्रक्रिया सरल होगी। आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ ने बताया, “यह बदलाव राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आर्थिक हितों को संतुलित करता है। पिछले साल चीनी निवेश प्रस्तावों में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, जो अब तेजी से मंजूर होंगे।”
चीन के लिए क्या मतलब? निवेश में उछाल की उम्मीद
चीन भारत में निवेश बढ़ाने के लिए लंबे समय से लॉबिंग कर रहा था। हाल के वर्षों में चीनी फर्मों ने इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और सोलर पैनल सेक्टर में रुचि दिखाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस ढील से चीनी कंपनियां जैसे BYD और CATL भारत में प्लांट लगाने को प्राथमिकता देंगी। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में चीन से FDI प्रस्ताव 25 अरब डॉलर के पार पहुंच चुके थे, लेकिन मंजूरी में देरी से 15 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।
हालांकि, विपक्ष ने चिंता जताई है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ न हो। गलवान की यादें ताजा हैं।” सरकार ने स्पष्ट किया कि सभी प्रस्तावों पर खुफिया एजेंसियों की स्क्रीनिंग होगी, और ‘ट्रस्टेड सोर्स’ सत्यापन अनिवार्य रहेगा। वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “हम आर्थिक लाभ लेंगे, लेकिन कोई जोखिम नहीं उठाएंगे।”
वैश्विक संदर्भ: मध्य पूर्व संकट के बीच रणनीतिक कदम
मध्य पूर्व में ईरान-अमेरिका तनाव से तेल संकट के बीच भारत वैकल्पिक निवेश स्रोत तलाश रहा है। यह FDI ढील अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं को भी प्रभावित कर सकती है, जहां ट्रंप प्रशासन ने भारत पर टैरिफ दबाव डाला है। भारत ने पिछले महीने ही अमेरिकी निवेश के लिए समान ढील दी थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की इस नीति की सराहना की है, जो 2026 में 7 प्रतिशत विकास दर सुनिश्चित करेगी।
उद्योग जगत ने स्वागत किया है। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) के महासचिव आर.एन. रवि ने कहा, “यह फैसला सप्लाई चेन को मजबूत करेगा और रोजगार सृजन को बढ़ावा देगा।” विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि अगले एक साल में चीनी FDI 30 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




