नई दिल्ली, 5 दिसंबर 2025 – रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दो दिवसीय भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक फैसला चर्चा का केंद्र बन गया है। पुतिन के स्वागत के लिए राजघाट पर आयोजित कार्यक्रम में पीएम मोदी ने अपनी बुलेटप्रूफ जगुआर एक्सजे या मर्सिडीज-मायबैक जैसे हाई-सिक्योरिटी वाहनों के बजाय एक साधारण टोयोटा फॉर्च्यूनर एसयूवी का चुनाव किया। यह दृश्य तब सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जब दोनों नेता खुले में फॉर्च्यूनर में सवार होकर राजघाट घूमते दिखे। सुरक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला न केवल दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास का प्रतीक है, बल्कि मोदी की ‘सुरक्षा के साथ सहजता’ की नीति को भी दर्शाता है। आइए जानते हैं कि इस फैसले के पीछे क्या कारण हो सकते हैं।
ऐतिहासिक विश्वास और व्यक्तिगत रिश्ते का प्रतीक
पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच 10 से अधिक मुलाकातें हो चुकी हैं, जो 2014 से चली आ रही हैं। 2019 के व्लादिवोस्तोक शिखर सम्मेलन से लेकर 2024 के मॉस्को दौरे तक, दोनों नेताओं ने कई बार खुले वाहनों में सैर की है। इस बार फॉर्च्यूनर का चुनाव इसी विश्वास का विस्तार लगता है। सुरक्षा स्रोतों के अनुसार, पुतिन का दौरा ‘हाई-प्रोफाइल’ था, लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसियों (आईबी, सीआईएसएफ) ने पूर्वी दिल्ली क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित घोषित कर दिया था। फॉर्च्यूनर, जो एसपीजी (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) की फ्लीट का हिस्सा है, में बेसिक आर्मरिंग है, लेकिन यह पूरी तरह बुलेटप्रूफ नहीं। फिर भी, मोदी ने इसे चुना ताकि पुतिन को ‘घर जैसा’ अनुभव मिले।
राजनीतिक विश्लेषक रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, “यह फैसला मोदी की डिप्लोमेसी का हिस्सा है। पुतिन जैसे नेता के साथ बुलेटप्रूफ कार में घूमना ‘डर’ का संदेश देता, जबकि फॉर्च्यूनर सहजता और समानता दिखाती है।” वास्तव में, 2021 के पुतिन दौरे के दौरान भी मोदी ने ओपन जिप्सी का इस्तेमाल किया था, जो रूस-भारत संबंधों की मजबूती को रेखांकित करता है।
सुरक्षा चुनौतियों के बीच स्मार्ट रणनीति
भारत में पीएम की सुरक्षा एसपीजी अधिनियम 1988 के तहत सुनिश्चित की जाती है, जिसमें बुलेटप्रूफ कारें, ड्रोन निगरानी और स्नाइपर कवर अनिवार्य हैं। फिर फॉर्च्यूनर क्यों? विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक ‘कैलकुलेटेड रिस्क’ था। फॉर्च्यूनर में एयरबैग, एबीएस ब्रेकिंग और 2.8 लीटर डीजल इंजन है, जो ऑफ-रोड क्षमता प्रदान करता है। राजघाट जैसे खुले इलाके में यह वाहन आसानी से घूम सकता है, जबकि भारी मर्सिडीज या बीएमडब्ल्यू एक्स5 जैसे वाहन गति और मोबिलिटी में पीछे रह जाते।
सुरक्षा सलाहकार ने एनडीटीवी को बताया, “फॉर्च्यूनर को ‘लाइट आर्मर्ड’ माना जाता है, जो 7.62 एमएम गोलियों का सामना कर सकती है। लेकिन असली सुरक्षा परिधि में 500 से अधिक कमांडो, हेलीकॉप्टर और आईडीआरआईएस (इंटेलिजेंस ड्रोन) थे।” इसके अलावा, यूक्रेन युद्ध के बीच पुतिन के दौरे पर वैश्विक खतरे बढ़े थे, लेकिन भारत ने इसे ‘शून्य रिस्क’ जोन बनाया। अजमेर दरगाह बम धमकी जैसी घटनाओं के बावजूद, दिल्ली को हाई अलर्ट पर रखा गया।
पर्यावरण और ‘मेक इन इंडिया’ का संदेश
एक दिलचस्प पहलू यह है कि फॉर्च्यूनर भारत में असेंबल होती है और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का हिस्सा है। टोयोटा किरलोस्कर मोटर ने 2023 से फॉर्च्यूनर का उत्पादन बेंगलुरु प्लांट में शुरू किया, जो स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देता है। मोदी, जो पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हैं, ने शायद यह संदेश भी देना चाहा कि डिप्लोमेसी में सादगी और स्थानीय उत्पादों का महत्व है। बुलेटप्रूफ कारें ज्यादातर आयातित होती हैं, जबकि फॉर्च्यूनर 70% स्वदेशी है। पुतिन ने भी इस पर टिप्पणी की, “भारत की कारें मजबूत हैं, जैसे हमारे टैंक।”
अन्य विकल्पों से तुलना: क्यों नहीं चुनीं ये कारें?
- जगुआर एक्सजेएल (बुलेटप्रूफ): पूरी तरह आर्मर्ड, लेकिन भारी (3 टन) और कम मोबाइल। राजघाट जैसे पार्क में अनुपयुक्त।
- मर्सिडीज-मायबैक एस-गार्ड: यूरोपियन डिजाइन, लेकिन ईंधन खपत अधिक और कीमत 10 करोड़ से ऊपर। फॉर्च्यूनर की तुलना में ‘रॉयल’ लेकिन कम व्यावहारिक।
- बीएमडब्ल्यू एक्स5 आर्मर्ड: ऑफ-रोड अच्छी, लेकिन फॉर्च्यूनर से महंगी मेंटेनेंस। एसपीजी इसे लंबी यात्राओं के लिए रखती है।
- रेंज रोवर सेंटिनल: ब्रिटिश, लेकिन आयातित। मोदी ने स्वदेशी विकल्प को प्राथमिकता दी।
विश्लेषकों का कहना है कि फॉर्च्यूनर (कीमत 35-40 लाख) न केवल किफायती है, बल्कि 4×4 क्षमता से आपात स्थिति में फायदेमंद।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं और भविष्य की संभावनाएं
यह फैसला अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोर रहा है। रूसी मीडिया आरटी ने इसे “मोदी-पुतिन ब्रदरहुड” का प्रतीक बताया, जबकि बीबीसी ने “सुरक्षा vs. डिप्लोमेसी” बहस छेड़ दी। सोशल मीडिया पर #ModiFortuner ट्रेंड कर रहा है, जहां यूजर्स इसे “ट्रस्ट डिप्लोमेसी” कह रहे हैं।
भविष्य में, ऐसे फैसले भारत की डिप्लोमेसी को और मजबूत करेंगे। जैसा कि पीएम मोदी ने कहा, “विश्वास ही सबसे मजबूत कवच है।” पुतिन के दौरे के अंत में जारी संयुक्त बयान में भी “सुरक्षा सहयोग” पर जोर दिया गया, जो रक्षा सौदों के साथ जुड़ा है। यह घटना साबित करती है कि मोदी की नेतृत्व शैली में सादगी और साहस का अनोखा मिश्रण है।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




