पटना, 15 नवंबर 2025 ( एसएसएन न्यूज): बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल राजनीतिक दलों की तस्वीर बदल दी, बल्कि लालू प्रसाद यादव के परिवार में भी गहरी दरार डाल दी। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की करारी हार के ठीक बाद, लालू की बेटी और पूर्व सांसद रोहिणी आचार्य ने एक चौंकाने वाले ऐलान के साथ राजनीति को अलविदा कह दिया। उन्होंने परिवार से भी दूरी बनाने का फैसला किया है, जिससे यादव परिवार में हाहाकार मच गया है। यह कदम बिहार की सियासत में एक नया मोड़ ला सकता है, जहां आरजेडी पहले ही विपक्षी महागठबंधन की कमजोरी के कारण पटखनी खा चुका है।
चुनावी हार का असर: रोहिणी का विद्रोह
बिहार चुनाव 2025 में आरजेडी को मात्र 35 सीटें मिलीं, जो 2015 के 80 से कम हैं। तेजस्वी यादव की अगुवाई वाला महागठबंधन एनडीए की ‘क्लीन स्वीप’ के आगे पानी भर गया। इस हार ने परिवार के भीतर असंतोष को जन्म दिया। रोहिणी आचार्य, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में सारण से जीतकर संसद पहुंची थीं, ने आज एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपना फैसला सुनाया। उन्होंने लिखा, “राजनीति के मैदान में अब तक की जंग ने मुझे थका दिया है। परिवार की जिम्मेदारियां और व्यक्तिगत शांति के लिए मैं राजनीति और परिवार दोनों से अलग हो रही हूं। बिहार के लोगों को धन्यवाद, लेकिन अब मेरा सफर अलग दिशा में।”
रोहिणी का यह ऐलान चुनावी हार से सीधा जुड़ा माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, वे पार्टी के आंतरिक कलह से नाराज थीं। आरजेडी में पिता लालू प्रसाद और भाई तेजस्वी के बीच रणनीति को लेकर मतभेद लंबे समय से चल रहे थे। रोहिणी ने सारण में अपनी सीट मजबूती से बचाई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी की लचर तैयारी ने उन्हें निराश कर दिया। एक करीबी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “रोहिणी को लगता था कि परिवारवाद की छाया में उनकी आवाज दब रही है। हार ने उन्हें अंतिम फैसला लेने पर मजबूर कर दिया।”
परिवार में खलबली: लालू-तेजस्वी की चुप्पी
लालू परिवार, जो बिहार की राजनीति का केंद्र रहा है, आज संकट के दौर से गुजर रहा है। लालू प्रसाद यादव, जो स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं, ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। तेजस्वी यादव, जो हार के बाद भी पार्टी की कमान संभालने की कोशिश में जुटे हैं, ने एक संक्षिप्त बयान जारी किया: “परिवार के फैसले व्यक्तिगत होते हैं। रोहिणी हमेशा हमारी बेटी और बहन रहेगी।” लेकिन अंदरखाने में यह खबर हलचल मचा रही है। मां राबड़ी देवी ने कथित तौर पर रोहिणी से बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।
विश्लेषकों का मानना है कि रोहिणी का कदम आरजेडी के लिए बड़ा झटका है। वे न केवल एक प्रभावशाली महिला नेता थीं, बल्कि युवा और महिला मतदाताओं के बीच लोकप्रिय भी। राजनीतिक पंडित शंकर दयाल का कहना है, “यह हार का प्रत्यक्ष परिणाम है। जब परिवार ही टूटने लगे, तो पार्टी कैसे बचेगी? रोहिणी का जाना तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करता है।”
भविष्य की संभावनाएं: क्या रोहिणी लौटेंगी?
रोहिणी आचार्य अब सिंगापुर या दिल्ली में शिफ्ट होने की तैयारी कर रही हैं, जहां वे अपनी मेडिकल प्रैक्टिस पर फोकस करेंगी। उन्होंने राजनीतिक भविष्य पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन कुछ स्रोतों का दावा है कि वे स्वतंत्र रूप से सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहेंगी। बिहार में उनकी अनुपस्थिति से आरजेडी को महिला विंग में कमजोरी आ सकती है, खासकर जब एनडीए महिलाओं को कैबिनेट में प्रमुखता दे रहा है।
यह घटना बिहार की राजनीति को नया आयाम दे रही है। जहां एक तरफ एनडीए सरकार गठन की कवायद में जुटा है, वहीं विपक्षी खेमे में आंतरिक कलह बढ़ रहा है। क्या रोहिणी का फैसला आरजेडी के पुनरुद्धार में बाधा बनेगा या यह परिवार को एकजुट करने का अवसर? समय ही बताएगा।
Author: saryusandhyanews
SENIOR JOURNALIST




